Sunday, July 19, 2020

Bhagwat Geeta भागवत गीता


 श्रीभगवानुवाच

श्रीभगवानुवाच

 

 इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे

ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्  

 श्रीभगवान् ने कहा-प्रिय अर्जुन! तुम मुझसे कभी द्वेष नहीं करते हो, इसलिए मैं तुम्हें यह अत्यन्त गोपनीय ज्ञान प्रदान करूँगा, जिसे जानकर तुम भौतिक अस्तित्व के क्लेशों से मुक्त हो जाओगे।" (भगवद गीता .)

भगवत गीता के नवम अध्याय के ये प्रारम्भिक शब्द सूचित करते हैं कि परम भगवान् बोल रहे हैं। यहाँ पर श्रीकृष्ण को भगवान कहा गया है। भग का अर्थ है 'ऐश्वर्य' और वान् का अर्थ है 'से युक्त' हमें ईश्वर की कुछ संकल्पना तो है, किन्तु ईश्वर से क्या तात्पर्य है इस विषय पर वैदिक साहित्य में सुनिश्चित उल्लेख एवं परिभाषाएँ दी गई हैं। वहाँ उन्हें एक शब्द भगवान्में वर्णित किया गया है। भगवान् समस्त ऐश्वर्य से युक्त हैं-सम्पूर्ण ज्ञान, धन, शक्ति, सौन्दर्य, यश तथा वैराग्य। जब हम किसी एक व्यक्ति में इन सारे ऐश्वर्यों को पूर्ण रूप में पाते हैं. तो हमें यह समझ लेना चाहिए कि वे भगवान हैं। यों तो अनेक धनी, ज्ञानी, प्रसिद्ध, सुन्दर तथा शक्तिमान् व्यक्ति हैं, किन्तु कोई भी व्यक्ति एकसाथ इन सारे ऐश्वर्या से युक्त होने का दावा नहीं कर सकता। केवल कृष्ण स्वयं इन ऐश्वर्यों से पूर्ण रूप से युक्त होने का दावा करते हैं। 


 "भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । 
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥




"मुझे समस्त यज्ञों और तपों का परम भोक्ता, समस्त लोकों तथा देवताओं का परमेश्वर और समस्त प्राणियों का हितकर्ता तथा शुभचिन्तक जानकर ऋषिगण भौतिक संसार के दुःखों से शान्ति प्राप्त करते हैं।" (भगवद्गीता .२९)

  यहाँ पर कृष्ण स्वयं को समस्त कार्यकलापों के भोक्ता तथा समस्त ग्रह मंडल के स्वामी (सर्वलोकमहेश्वरम्) घोषित करते हैं। कोई व्यक्ति विस्तृत भूखंड का स्वामी होने के कारण गर्व का अनुभव कर सकता है, किन्तु कृष्ण स्वयं को समस्त लोकों के स्वामी होने का दावा करते हैं। कृष्ण अपने को समस्त जी मित्र होने का भी दावा करते हैं (सुहृदं सर्वभूतानां) जब कोई व्यक्ति यह समझ लेता है कि भगवान प्रत्येक वस्तु के स्वामी प्रत्येक व्यक्ति के मित्र तथा सर्वस्व के भोक्ता हैं, तो वह अत्यन्त शान्त हो जाता है। शान्ति का वास्तविक सूत्र यही है। जब तक मनुष्य यह सोचता है कि 'मैं स्वामी हूँ' तब तक उसे शान्ति नहीं मिल सकती। भला स्वामित्व का दावा कर सकने की क्षमता किसकी है? हम सब यहाँ आते हैं और अपने को इसका स्वामी होने का झूठा दावा करते हैं। मिथ्या स्वामित्व की यह विचारधारा वैदिक आदेशों से अनुरूप नहीं है। श्री ईशोपनिषद् का कथन है कि, "इस ब्रह्माण्ड के भीतर प्रत्येक चर या अचर वस्तु भगवान द्वारा नियन्त्रित है और वे ही इनके स्वामी हैं (ईशावास्यं इदं सर्वम्)" यह कथन एक वास्तविकता है, किन्तु भ्रमवश हम अपने को ही स्वामी मान बैठते हैं। वास्तव में सब कुछ ईश्वर का है, अत: उन्हें सर्वाधिक धनवान कहा जाता है।


निस्सन्देह, ऐसे अनेक आदमी हैं, जो स्वयं भगवान होने का दावा करते हैं। उदाहरणार्थ, भारत में किसी भी समय दर्जनों ऐस लोग सरलता से ढूँढ़े जा सकते हैं, जो भगवान होने का दावा करते हैं। किन्तु यदि उनसे यह पूछा जाए कि क्या वे प्रत्येक वस्तु के स्वामी हैं, तो उनके लिए इसका उत्तर दे पाना कठिन हो जाता है। यह ऐसी कसौटी है जिसके द्वारा हम जान सकते हैं कि कौन भगवान् है। भगवान् प्रत्येक वस्तु के स्वामी हैं, अतः इस नाते वे अवश्य हर किसी व्यक्ति से तथा किसी भी वस्तु से अधिक शक्तिमान होने चाहिए। जब कृष्ण साक्षात् इस पृथ्वी पर उपस्थित थे, तो उन्हें कोई पराजित नहीं कर सका था। युद्ध में उनके कभी भी पराजित होने का कोई साक्ष्य नहीं है। वे क्षत्रिय-वंशी थे और क्षत्रियों का धर्म है, निर्बलों की रक्षा करना। जहाँ तक उनके ऐश्वर्य की बात है, उनकी १६,१०८ पत्नियाँ थीं। प्रत्येक पत्नी का अपना एक अलग महल था और समस्त पत्नियों के साथ रमण करने के लिए उन्होंने अपने को १६,१०८ रोगों में विस्तारित किया था। यह अविश्वसनीय सा लगता है, किन्तु इसका उल्लेख श्रीमद्भागवत में हुआ है, जिसे भारत के महान् ऋषि शास्त्र के रूप में तथा कृष्ण को भगवान के रूप में स्वीकार करते हैं।


इस नवम अध्याय के प्रथम श्लोक में आये गुह्यतमम् शब्द द्वारा श्रीकृष्ण बताते हैं कि वे अर्जुन को अत्यन्त गोपनीय ज्ञान प्रदान कर रहे हैं। आखिर, वे अर्जुन से ऐसा क्यों कह रहे हैं?


इसका कारण यह है कि अर्जुन द्वेष रहित-अनसूया-है। भौतिक जगत में यदि हमसे कोई श्रेष्ठ होता है, तो हम उससे ईर्ष्या करने लगते हैं। हम केवल एक दूसरे से ईर्ष्या करते हैं, अपितु भगवान से भी ईर्ष्या करते हैं। यही नहीं, जब कृष्ण कहते हैं कि 'मैं स्वामी हूँ' तो हम इस पर विश्वास नहीं करते। किन्तु अर्जुन के साथ ऐसी बात नहीं है; वे ईर्ष्या रहित होकर कृष्ण की बात सुनते हैं। अर्जुन कृष्ण के साथ तर्क-वितर्क नहीं करते वरन वे जो कुछ कहते हैं उसे स्वीकार कर लेते हैं। यह उनकी एक विशेष योग्यता है और यही भगवत गीता को समझने की विधि है। अपनी मानसिक परिकल्पना से ईश्वर को समझ पाना सम्भव नहीं है; इसके लिए हमें श्रवण करना होगा तथा स्वीकार करना होगा। चूँकि अर्जुन ईर्ष्या रहित हैं, इसलिए श्रीकृष्ण उन्हें यह विशिष्ट ज्ञान सुनाते हैं। यह केवल सैद्धान्तिक ज्ञान होकर व्यावहारिक विज्ञान भी है (विज्ञान सहितम्) भगवद्गीता से हमें जो भी ज्ञान प्राप्त होता है, उसे भावुकता या धर्मान्धता के रूप में नहीं लेना चाहिए। यह विद्या ज्ञान तथा विज्ञान दोनों ही है, अर्थात् सैद्धान्तिक ज्ञान के साथ ही वैज्ञानिक ज्ञान भी है। यदि कोई इस ज्ञान में प्रबुद्ध हो ले, तो उसकी मुक्ति निश्चित है। इस भौतिक जगत में जीवन स्वाभाविक रूप से अमांगलिक तथा क्लेशपूर्ण है। मोक्ष का अर्थ है मुक्ति और यह वचन दिया गया है कि इस ज्ञान का मर्म समझ लेने से मनुष्य को समस्त क्लेशों से मुक्ति मिल जायेगी। अतः यह जान लेना महत्त्वपूर्ण है कि कृष्ण इस ज्ञान के सम्बन्ध में क्या कहते हैं। 


राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्  

प्रत्यक्षावगमं धम्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥


    “यह ज्ञान सब विद्याओं का राजा तथा सम्पूर्ण गोपनीय रहस्यों का रहस्य है। यह परम शुद्ध है और चूँकि यह आत्म स्वरूप काप्रत्यक्ष साक्षात्कार कराने वाला है, अतः यह धर्म की पूर्णता है। यह अविनाशी है और इसकी सूचना भी सुखमय है।"(भगवद्गीता .


भगवद्गीता के अनुसार सर्वश्रेष्ठ विद्या (राज विद्या राजगुह्यम्) कृष्णभावनामृत है, क्योंकि भगवद्गीता से पता चलता है कि जिसे वास्तविक विद्या प्राप्त हुई रहती है, उसका लक्षण यह है कि वह कृष्ण का शरणागत हो चुका होता है। जब तक हम आत्मसमर्पण किये बिना ईश्वर के विषय में मनोकल्पना करते रहते हैं, तब तक इसका यही अर्थ होता है कि हमें पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है। ज्ञान की पूर्णता तो इस प्रकार होती है :


बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। 

 वासुदेवः सर्वमिति महात्मा सुदुर्लभ:


अनेक जन्म-जन्मान्तरों के अन्त में वास्तविक ज्ञान को प्राप्त हुआ पुरुष मुझे सब कारणों का तथा सब वस्तुओं का परम कारण जान कर मेरी शरण में आता है। ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।" (भगवद गीता .१९)

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